Hindi Varnamala - Swar - हिन्दी वर्णमाला: स्वर ज्ञान
हिन्दी वर्णमाला: स्वर ज्ञान - एक संपूर्ण मार्गदर्शिका
हिन्दी भाषा की नींव को समझें: स्वरों के प्रकार, वर्गीकरण और उच्चारण स्थान का विस्तृत विश्लेषण।
परिचय: हिन्दी वर्णमाला
हिन्दी वर्णमाला, कुल 52 वर्णों का एक व्यवस्थित समूह है। इसमें ध्वनियों के दो मुख्य प्रकार हैं: स्वर और व्यंजन। यह ब्लॉग पोस्ट स्वरों पर केंद्रित है, जो हिन्दी भाषा की ध्वनि संरचना का आधार हैं।
- सामान्य/व्यावहारिक हिंदी में वर्णों की संख्या: 44
- मानक हिंदी में वर्णों की संख्या: 52 (11 स्वर + 2 अयोगवाह + 33 व्यंजन + 4 संयुक्ताक्षर + 2 उत्क्षिप्त)
स्वर: परिभाषा और प्रकार
जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी अवरोध या अन्य वर्ण की सहायता के होता है, उन्हें स्वर कहते हैं। हिन्दी में कुल 11 स्वर होते हैं: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।
मात्रा/उच्चारण काल के आधार पर स्वर के भेद:
- ह्रस्व स्वर/लघु स्वर (एकमात्रिक): जिनके उच्चारण में कम से कम समय लगता है। ये चार हैं: अ, इ, उ, ऋ।
- दीर्घ स्वर/गुरु स्वर (द्विमात्रिक): जिनके उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से अधिक समय लगता है। ये हिन्दी में सात हैं: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।
- प्लुत स्वर: संस्कृत भाषा में प्रयुक्त होते हैं, हिंदी में सामान्यतः नहीं। इनके उच्चारण में दीर्घ स्वर से भी अधिक (तिगुना) समय लगता है। जैसे: ओ३म्।
रचना/संरचना के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण
मूल स्वर/जड़स्वर (नैसर्गिक स्वर/बीजाक्षर स्वर):
वे स्वर जो अपने आप में स्वतंत्र हैं और जिनका निर्माण किसी अन्य स्वर के योग से नहीं हुआ है। ये चार हैं: अ, इ, उ, ऋ।
संधि स्वर/कृत्रिम स्वर (बनावटी स्वर):
वे स्वर जो दो स्वरों के मेल (संधि) से बने हैं।
- सजातीय संधि स्वर/मूल दीर्घ स्वर: एक समान स्वरों की संधि से बने हैं। जैसे: अ + अ = आ, इ + इ = ई, उ + उ = ऊ।
- विजातीय संधि स्वर/संयुक्त दीर्घ स्वर: अलग-अलग स्वरों की संधि से बने हैं। ये चार हैं: ए (अ + इ), ऐ (अ + ए), ओ (अ + उ), औ (अ + ओ)।
उच्चारण की दृष्टि से स्वरों का वर्गीकरण
जीभ के भाग के आधार पर:
- अग्रभाग (अग्र स्वर): इ, ई, ए, ऐ (04)
- मध्यभाग (मध्य स्वर): अ (01)
- पश्च भाग (पश्च स्वर): आ, उ, ऊ, ओ, औ (05)
- आगत ध्वनि: 'ऑ' (अंग्रेजी से गृहीत), इसे भी पश्च स्वर के अंतर्गत रखा जा सकता है।
मुखाकृति के आधार पर (मुख के खुलने के आधार पर):
- संवृत स्वर: इ, ई, उ, ऊ (मुख सबसे कम खुलता है)
- अर्द्ध संवृत स्वर: ए, ओ (मुख आधे से कम खुलता है)
- अर्द्ध विवृत स्वर: ऐ, औ, (ऑ) (मुख आधे से ज्यादा खुलता है)
- विवृत स्वर: आ (मुँह सबसे अधिक खुलता है)
ओष्ठो मुख्याकृति के आधार पर
- वर्तुल स्वर/गोलाकार (वृत्तमुखी/वृत्ताकार): जिनके उच्चारण में ओष्ठ गोल हो जाते हैं। जैसे: उ, ऊ, ओ, औ, (ऑ)।
- अवृत्तमुखी/प्रसृत/अवृत्ताकार: जिनके उच्चारण में ओष्ठ गोल नहीं होते बल्कि फैल जाते हैं। जैसे: अ, आ, इ, ई, ए, ऐ।
- टिप्पणी: 'ऋ' अर्द्ध वृत्ताकार स्वर है।
उच्चारण स्थान के आधार पर स्वरों के भेद:
- कंठ्य स्वर: अ, आ
- तालव्य स्वर: इ, ई
- मूर्धन्य स्वर:ऋ
- ओष्ठ्य स्वर: उ, ऊ
- कंठ्य-तालव्य स्वर: ए, ऐ
- कंठोष्ठ्य स्वर: ओ, औ
अयोगवाह ध्वनियाँ
वे ध्वनियाँ जिनका किसी वर्ण से योग नहीं होता है, उन्हें अयोगवाह ध्वनियाँ कहते हैं। ये दो हैं: अं (अनुस्वार) और अः (विसर्ग)।
- अनुस्वार (अं): जब हवा केवल नाक से निकलती है। जैसे: बंदर, कंधा।
- अनुनासिक (ँ): जब हवा नाक और मुख दोनों से निकलती है। जैसे: पंखुड़ी, ताँगा।
- विसर्ग (अः): इसका उच्चारण 'ह' के समान होता है और यह प्रायः संस्कृत के तत्सम शब्दों में प्रयुक्त होता है। जैसे: प्रातः, अतः।
स्वरों के संदर्भ में विशेष तथ्य/विशेषताएं
- स्वर स्वतः उच्चरित होते हैं, इन्हें किसी अन्य ध्वनि की सहायता नहीं लेनी पड़ती।
- 'ऋ' का प्रयोग केवल तत्सम शब्दों में होता है, अतः इसे तत्सम स्वर कहते हैं।
- 'ऑ' अंग्रेजी से हिंदी में आया है, इसे आगत या गृहीत स्वर कहते हैं।
- सभी स्वर 'अल्पप्राण' होते हैं क्योंकि इनके उच्चारण में श्वास की मात्रा कम लगती है।
- सभी स्वर 'घोष/सघोष' होते हैं क्योंकि इनके उच्चारण में स्वर-तंत्रियों में कंपन होता है।
- स्वर ध्वनियों के अंतर्गत कोई भी ध्वनि दंत्य ध्वनि नहीं है।
- अयोगवाह ध्वनियों का प्रयोग मुख्यतया तत्सम शब्दों में होता है। विसर्ग हमेशा तत्सम होता है।
- इ, ई एवं ऋ स्त्रीलिंग वर्ण हैं।


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