Ancient History Notes - Vaidik Kaal , Uttar Vaidik Kaal in Hindi

वैदिक काल: प्राचीन भारतीय इतिहास नोट्स

वैदिक काल: प्राचीन भारतीय इतिहास नोट्स

वैदिक संस्कृति

वैदिक संस्कृति के अंतर्गत चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद), ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक एवं उपनिषद आते हैं। वैदिक साहित्य की रचना आर्यों ने की थी, जो उनसे संबंधित जानकारी के मुख्य स्रोत हैं।

  • भारत आगमन के क्रम में आर्य मध्य एशिया और ईरान पहुँचे, तत्पश्चात् वे पंजाब आए, जिसे ऋग्वेद में सप्तसिन्धव कहा गया है, और पूरे उत्तर भारत में फैल गए।

ऋग्वैदिक काल

भौगोलिक विस्तार

  • ऋग्वैदिक आर्य अफगानिस्तान, पंजाब, सिन्ध के एक भाग, कश्मीर, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में फैले हुए थे।
  • ऋग्वेद में अफगानिस्तान की नदियों कुभा, क्रमु, गोमती, सुवास्तु का उल्लेख है।
  • ऋग्वेद में उत्तर भारत की कुल 42 नदियों का उल्लेख है, जो अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में यमुना नदी तक फैली हुई थीं।

प्रमुख नदियाँ और उनके आधुनिक नाम:

  • कुभा (काबुल)
  • सुवास्तु (स्वात)
  • क्रुमु (कुर्रम)
  • गोमती (गोमल)
  • वितस्ता (झेलम)
  • अस्किनी (चिनाब)
  • पुरुष्णी (रावी)
  • शुतुद्री (सतलज)
  • विपाशा (व्यास)
  • सदानीरा (गण्डक)
  • दृषद्वती (घग्घर)
  • मरुवृद्धा (मरुवर्मन)
  • सुषामा (सोहन)

राजनीतिक स्थिति

  • ऋग्वैदिक राजनीतिक व्यवस्था एक कबीलाई संरचना पर आधारित थी। यह एक जनजातीय सैन्य तंत्र था।
  • इस काल में राजा को जनस्यगोपा, विशपति, गणपति, गोपति, पुरभेत्ता आदि नामों से जाना जाता था।

सामाजिक जीवन

  • आर्यों ने खानाबदोशी जीवन छोड़कर पारिवारिक जीवन शुरू कर दिया था। परिवार पितृसत्तात्मक था तथा पिता परिवार का मुखिया होता था।
  • 'गोत्र' सामाजिक संगठन का आधार था।
  • समाज तीन भागों में विभक्त था: पुरोहित, राजन्य तथा सामान्य लोग। 'वर्ण' शब्द कर्म का द्योतक था।
  • इस काल में बाल विवाह, सती प्रथा, तलाक, पर्दा प्रथा, बहुपत्नीत्व प्रथा आदि का प्रचलन नहीं था।
  • विधवा विवाह और नियोग प्रथा का प्रचलन था।
  • जीवनभर अविवाहित रहने वाली लड़कियों को अमाजू कहा जाता था।
  • ऋग्वैदिक आर्य शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों थे। चावल और जौ भोज्य पदार्थ थे। फल, दूध, दही, घी, खीर (क्षीर पकोदनम) का प्रयोग किया जाता था। जौ के सत्तू में दही मिलाकर करभ तैयार किया जाता था।
  • भेड़, बकरी और बैल का मांस खाया जाता था। घोड़े का मांस अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर खाया जाता था।
  • गाय को अघन्या (न मारने योग्य) कहा गया है।

आर्थिक जीवन

  • पशुपालन की तुलना में कृषि गौण पेशा था। गायों का अत्यंत महत्व था। आर्यों की अधिकांश लड़ाइयाँ गायों को लेकर हुई हैं।
  • ऋग्वेद में गविष्टि (गाय का अन्वेषण) युद्ध का पर्याय है। युद्ध के लिए गवेषण, गव्य, गेसू, गम्य आदि शब्द प्रचलित थे।
  • राजा को गोपति तथा धनी व्यक्ति को गोमत कहा जाता था।
  • ऋग्वेद में 'गो' शब्द का प्रयोग 176 बार आया है।
  • मुद्रा के रूप में निष्क एवं शतमान का उल्लेख मिलता है, किंतु ये नियमित सिक्के नहीं थे। ये स्वर्णाभूषण थे जो विनिमय का माध्यम बन गए।

ऋग्वेद में प्रमुख शब्दों का उल्लेख

शब्द उल्लेख की संख्या शब्द उल्लेख की संख्या
इन्द्र250बृहस्पति11
अग्नि200जन275
वरुण30विश171
विष्णु100वर्ण23
माता234सभा08
सोम144समिति09
गंगा01गण46
यमुना03राष्ट्र10
रुद्र03पृथ्वी01
विदथ122

धार्मिक जीवन

  • आर्यों का धार्मिक जीवन विशद् और पवित्र था। लोग बहुदेववादी थे। धर्म मुख्यतः प्रकृति पूजा और यज्ञ केंद्रित था।
  • ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में निर्गुण ब्रह्म और ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन है।
  • ऋग्वैदिक देवताओं का वर्गीकरण तीन भागों में किया गया है:
    1. पृथ्वी के देवता: अग्नि, सोम, बृहस्पति, सरस्वती, पृथ्वी आदि।
    2. अंतरिक्ष के देवता: इन्द्र, रुद्र, वायु, पर्जन्य, प्रजापति, यम, अदिति, मातरिश्वन आदि।
    3. आकाश (द्युस्थान) के देवता: द्यौस, सूर्य, मित्र, वरुण, सवितृ, विष्णु, पूषन, आदित्य, ऊषा, आश्विन आदि।

उत्तर वैदिक काल (1000 से 600 ई. पू.)

  • इस काल के महत्त्वपूर्ण साक्ष्य चित्रित धूसर मृद्भाण्ड तथा लोहे के उपकरण हैं। पाकिस्तान के गांधार से 1000 ई. पू. के लोहे के उपकरण प्राप्त हुए हैं।

राजनीतिक स्थिति

  • इस काल में ऋग्वैदिक काल के कबीलाई राज्य, क्षेत्रीय राज्यों में परिवर्तित होने लगे। 'जन' का स्थान जनपद ने ले लिया।
  • युद्ध गायों के लिए न होकर क्षेत्र के लिए होने लगा। कबीलाई राज्य संयुक्त होकर बड़े और शक्तिशाली राज्य बनने लगे।

शतपथ ब्राह्मण में रलिन की संख्या 12 है (राज्य के अधिकारी):

शतपथ ब्राह्मण के 12 रलिन (अधिकारी)

  1. पुरोहित
  2. ग्रामणी (गाँव का मुखिया)
  3. सेनानी
  4. युवराज
  5. महिषि (रानी)
  6. सूत (राजा का सारथी)
  7. प्रतिहारी या क्षत्र (द्वारपाल)
  8. संगृहित्री (कोषाध्यक्ष)
  9. भागदुध (कर संग्रहकर्ता)
  10. अक्षवाप (पासे के खेल में राजा का सहयोगी)
  11. पालागल (संदेशवाहक)
  12. गोविकर्तन (शिकार में राजा की सहायता करने वाला)

सामाजिक स्थिति

  • इस काल में वर्णव्यवस्था का आधार कर्म न होकर जन्म हो गया। वर्ण व्यवस्था में कठोरता आने लगी।
  • सामाजिक विभाजन चार वर्षों में हो गया: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
  • सर्वप्रथम जावालोपनिषद् में चारों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास) का उल्लेख मिलता है।
  • गोत्र की अवधारणा पहली बार इसी काल में आयी। गोत्र, अर्थात् वह स्थान जहाँ पूरे गोत्र का गोधन रखा जाता था। कालांतर में एक ही मूल पुरुष से उत्पन्न व्यक्ति एक गोत्र के कहे जाने लगे।

आर्थिक स्थिति

  • यजुर्वेद में ब्राहि (धान), यव (जौ), मुद्ग (मूंग), माष (उड़द), गोधूम (गेहूँ), मसूर आदि अनाजों का उल्लेख है।
  • अनाज मापने का पात्र उर्वर कहलाता था।
  • धातु के चोंच वाले फाल (प्रवीरवन्त) का उल्लेख मिलता है। इन्द्र को सुनासिर (हलवाहा) कहा गया है।
  • मुद्रा ज्ञात थी, किन्तु लेन-देन विनिमय द्वारा ही होता था। बाट की मूलभूत इकाई कृष्णल थी।
  • शतमान सम्भवतः चांदी की मुद्रा थी। रक्तिका एवं गुंजा तौल की इकाई थी। निष्क संभवतः 320 रत्ती का एक स्वर्ण ढेला था।

धार्मिक स्थिति

  • इस काल में ऋग्वैदिक देवताओं का महत्व घट गया तथा नए देवताओं को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। इन्द्र, वरुण आदि का स्थान प्रजापति, विष्णु एवं रुद्र-शिव ने ले लिया।
  • इस काल के अंतिम दौर में यज्ञों, कर्मकाण्डों तथा पुरोहितवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया का जन्म हुआ।

वैदिक साहित्य

वैदिक साहित्य के अन्तर्गत चार वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् तथा वेदांग आते हैं।

ऋग्वेद

  • इसमें 10 मण्डल, 1028 सूक्त तथा 10,462 श्लोक हैं। सूक्तों में बालखिल्य सूक्त भी शामिल हैं।
  • ऋग्वेद का दूसरा से सातवां मण्डल सबसे पुराना है तथा दसवाँ मण्डल सबसे नया है।
  • गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में है, जो सूर्य को समर्पित है तथा रचयिता विश्वामित्र हैं।

सामवेद

  • कुल ऋचाएँ 1,875, जिसमें से 75 को छोड़, शेष ऋग्वेद से लिए गए हैं।
  • इसके दो भाग हैं- आर्चिक तथा गान। इसके तीन पाठ हैं- कौमुथ, जैमिनीय तथा राणायनीय संहिता।
  • यह भारतीय संगीतशास्त्र पर प्रथम पुस्तक है। इसके पद्य गाने योग्य हैं।

यजुर्वेद

  • इसमें 40 मण्डल तथा 1549 मंत्र हैं।
  • इसके दो भाग हैं- शुक्ल तथा कृष्ण यजुर्वेद। शुक्ल में मात्र मंत्रों का संग्रह है, किन्तु कृष्ण में मंत्र तथा गद्य काव्य दोनों का संकलन है।

अथर्ववेद

  • इसकी रचना अथर्वा ऋषि ने की थी। इसकी दो शाखाएँ हैं- शौनक एवं पिप्लाद।
  • इसे ब्रह्मवेद, भैषज्य वेद तथा महीवेद भी कहा जाता है।
  • इसमें वास्तुशास्त्र से संबद्ध महत्त्वपूर्ण ज्ञान का वर्णन है। इसमें रोग निवारण और जादू-टोनों की जानकारी दी गयी है।

ब्राह्मण

  • कर्मकाण्डों की व्याख्या करने के लिए ब्राह्मणों की रचना की गयी।
  • गद्य में लिखे गए ब्राह्मणों में यज्ञ को आनुष्ठानिक महत्त्व दिया गया है।

आरण्यक

  • इनकी रचना ऋषियों द्वारा जंगल में की गयी थी।
  • इसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय दर्शन, रहस्यवाद तथा प्रतीकवाद है।

उपनिषद्

  • यह प्राचीन दार्शनिक विचारों का संग्रह हैं। इसकी संख्या 108 है।
  • इसमें मुख्य रूप से आत्म-ब्रह्म के संबंधों पर चर्चा है। ब्रह्म विषयक होने के कारण इन्हें ब्रह्म विद्या भी कहा जाता है।

वेद, उनके ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् एवं उपवेद

वेद ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद् उपवेद
ऋग्वेदऐतरेय, कौषितकीऐतरेय, कौषितकीऐतरेय, कौषितकीआयुर्वेद
सामवेदपंचविश, छांदोग्य, ष‌ड्विश, जैमिनीयछांदोग्य, जैमिनीयछांदोग्य, केनगंधर्व वेद
यजुर्वेदतैत्तरीय, शतपथवृहदारण्यक, तैत्तरीयश्वेताश्वर, ईश, वृहदारण्यक, मैत्रायणी, कठ, तैत्तरीयधनुर्वेद
अथर्ववेदगोपथ-मुण्डक, प्रश्न, माण्डुक्यशिल्पवेद

जैन धर्म

  • ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर थे, जिनका जन्म अयोध्या में हुआ था तथा इन्होंने कैलाश पर्वत पर अपना शरीर त्यागा था। इन्हें आदिनाथ भी कहा जाता है। इनकी तथा अरिष्टनेमि की चर्चा ऋग्वेद में है।
  • पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे। ये काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। 30 वर्ष की आयु में संन्यास लिया तथा 83 दिनों की घोर तपस्या के पश्चात् उन्हें परम ज्ञान (कैवल्य) प्राप्त हुआ।
  • महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर तथा वास्तविक संस्थापक थे। इनका मूल नाम वर्द्धमान था।

वर्द्धमान महावीर जीवन परिचय

जन्म540 ई. पू. कुण्डग्राम (वैशाली)
मातात्रिशला (विदेहदत्ता) लिच्छवी
पितासिद्धार्थ (ज्ञातृक कुल के प्रधान)
पत्नीयशोदा (कुण्डिन्य गोत्र की कन्या)
पुत्रीप्रियदर्शना या अणर्णोज्जा
दामादजमालि
मृत्यु468 ई. पू. पावा (नालंदा) में राजा हस्तिपाल के यहाँ
  • 12 वर्षों की कठोर तपस्या के पश्चात् जृम्भिक गाँव के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे वर्द्धमान को कैवल्य (ज्ञान) प्राप्त हुआ, जिसके बाद वे केवलिन कहलाए।
  • सभी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के कारण उन्हें जिन अर्थात् विजेता कहा गया। तपस्या के रूप में अद्भुत पराक्रम दिखाने के कारण उन्हें महावीर एवं निर्ग्रन्थ (बन्धन रहित) कहा गया।

जैन धर्म के सिद्धान्त एवं दर्शन

पंचव्रत (महाव्रत)

पार्श्वनाथ ने अपने शिष्यों को चार महाव्रत पालन करने की सलाह दी। महावीर ने इसमें पाँचवाँ व्रत ब्रह्मचर्य जोड़ा। ये पाँच महाव्रत हैं:

  1. सत्य
  2. अहिंसा
  3. अस्तेय (चोरी न करना)
  4. अपरिग्रह (धन संचय न करना)
  5. ब्रह्मचर्य

गृहस्थ जीवन व्यतीत करनेवाले जैनियों के लिए भी इन्हीं व्रतों की व्यवस्था है, किंतु उनकी कठोरता में कमी कर दी गयी है, इसलिए इन्हें अणुव्रत कहा गया है।

अनन्त चतुष्ट्य (मोक्ष प्राप्ति हेतु)

मोक्ष प्राप्ति हेतु महावीर ने अनन्त चतुष्ट्य की संकल्पना की। ये चार हैं:

  1. अनंत ज्ञान
  2. अनंत दर्शन
  3. अनंत वीर्य
  4. अनंत सुख

त्रिरत्न

पूर्व जन्म के कर्मफल को समाप्त करने एवं वर्तमान जन्म के कर्मफल से बचने के लिए महावीर ने त्रिरत्न का सिद्धांत दिया:

  1. सम्यक् दर्शन (सही विश्वास)
  2. सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान)
  3. सम्यक् आचरण (सही आचरण)

सम्यक् ज्ञान के पाँच प्रकार:

  1. मति (इंद्रिय जनित ज्ञान)
  2. श्रुति (श्रवण ज्ञान)
  3. अवधि (दिव्य ज्ञान)
  4. मनः पर्याय (दूसरे के मन की बात जान लेना)
  5. कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान)

जैन संगीति

जैन संगीतियाँ

संगीति (सम्मेलन) समय स्थान अध्यक्ष कार्य
प्रथम322-298 ई. पू.पाटलिपुत्रस्थूलभद्र12 अंगों का संकलन, धर्म दो शाखाओं- श्वेताम्बर एवं दिगम्बर में विभक्त।
द्वितीय512 ई. पू.वल्लभीदेवर्धि क्षमा श्रमण11 अंग लिपिबद्ध, 12 उपांगों का संकलन।

श्वेताम्बर और दिगम्बर के विचार

श्वेताम्बर विचार

  • मोक्ष हेतु वस्त्र त्याग आवश्यक नहीं
  • स्त्रियों को निर्वाण का अधिकार
  • कैवल्य प्राप्ति के पश्चात् भी भोजन आवश्यक
  • महावीर विवाहित
  • जैन साहित्य मान्य
  • 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ स्त्री थी
  • उपसंप्रदाय: पुजेरा, स्थानकवासी, थेरापंथी

दिगम्बर विचार

  • मोक्ष प्राप्ति हेतु वस्त्र त्याग आवश्यक
  • स्त्रियों का निर्वाण संभव नहीं
  • कैवल्य प्राप्ति के बाद भोजन की आवश्यकता नहीं
  • महावीर अविवाहित
  • जैन साहित्य मान्य नहीं; केवल भद्रबाहु की शिक्षा मान्य
  • 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ पुरुष
  • उपसंप्रदाय: बीसपंथी, थेरापंथी, तारणपंथी, गुमानपंथी, तोतापंथी

बौद्ध धर्म

  • बौद्ध धर्म के प्रणेता गौतम बुद्ध ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग दिया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में महाभिनिष्क्रमण कहा गया है।
  • छह वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात् 35 वर्ष की आयु में गया के समीप उरवेला नामक स्थान पर निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा को ज्ञान (निर्वाण) प्राप्त हुआ और वे बुद्ध कहलाए।
  • निर्वाण प्राप्ति के पश्चात् बुद्ध उरवेला से सर्वप्रथम ऋषिपतन (सारनाथ) आए। जहाँ उन्होंने 5 ब्राह्मण संन्यासियों को अपना प्रथम उपदेश दिया, जिसे धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है।

गौतम बुद्ध : जीवन परिचय

जन्म563 ई. पू. लुम्बिनी वन (कपिलवस्तु)
मातामहामाया (कोलिय गणराज्य की कन्या)
पिताशुद्धोधन (शाक्यगण के प्रधान)
बचपन का नामसिद्धार्थ
पत्नीयशोधरा (गोप, बिम्ब, भद्रकच्छना)
मौसीप्रजापति गौतमी
पुत्रराहुल
घोड़ाकन्थक
सारथीचन्न (छन्न)
प्रारंभिक गुरुआलार कलाम (सांख्य आचार्य) एवं रुद्रक रामपुत्र
मृत्यु483 ई. पू. (कुशीनगर, उत्तर प्रदेश)

बुद्ध के जीवन से संबंद्ध 5 चिह्न:

  • जन्म: कमल व सांड
  • गृहत्याग: घोड़ा
  • ज्ञान: पीपल बोधि वृक्ष
  • निर्वाण: पदचिह्न
  • मृत्यु: स्तूप

बौद्ध धर्म की शिक्षा एवं धर्म-दर्शन

चार आर्य सत्य:

  1. संसार दुःखों का घर है।
  2. तृष्णा (इच्छा) दुःखों का कारण है।
  3. इच्छाओं के त्याग से ही दुःखों से छुटकारा पाया जा सकता है।
  4. इच्छा को अष्टमार्ग पर चलकर समाप्त किया जा सकता है।

आष्टांगिक मार्ग:

  1. सम्यक् दृष्टि (सही समझ)
  2. सम्यक् संकल्प (सही विचार)
  3. सम्यक् वचन (सही वाणी)
  4. सम्यक् कर्म (सही कर्म)
  5. सम्यक् आजीविका (सही जीवनयापन)
  6. सम्यक् प्रयत्न (सही प्रयास)
  7. सम्यक् विचार (सही स्मृति)
  8. सम्यक् समाधि (सही एकाग्रता)

त्रिरत्न एवं शील के नियम:

बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं: बुद्ध, संघ एवं धम्म।

बौद्ध भिक्षुओं के लिए 10 शील के नियम अनिवार्य हैं, जिनमें प्रथम पाँच उपासकों के लिए भी अनिवार्य हैं।

दस शील के नियम (नैतिक जीवन का आधार):

  1. अहिंसा
  2. सत्य
  3. अस्तेय (चोरी न करना)
  4. व्यभिचार न करना
  5. मद्य का सेवन न करना
  6. असमय भोजन न करना
  7. सुखप्रद विस्तर पर न सोना
  8. सुगंधित वस्तुओं का सेवन नहीं करना
  9. धन संचय न करना
  10. स्त्रियों का संसर्ग न करना

बौद्ध संगीतियाँ

काल स्थान अध्यक्षता शासक कार्य
483 ई. पू.राजगृह (सप्तपर्णी गुफा)महाकस्सपअजातशत्रुसुत्त एवं विनय पिटक का संग्रहण
383 ई. पू.वैशालीसुबुकामीकालाशोकबौद्धसंघ स्थविर एवं महासंघिक में बँटा
251 ई. पू.पाटलिपुत्रमोग्लीपुत्ततिस्यअशोकअभिधम्म पिटक का संकलन कर कत्थावशु को जोड़ा गया।
102 ई. पू.कश्मीर (कुण्डलवन)वसुमित्र (अश्वघोष-उपाध्यक्ष)कनिष्कबौद्ध धर्म हीनयान एवं महायान में बँटा तथा विभाषाशास्त्र का संकलन किया गया।

बौद्ध ग्रंथ एवं उनके लेखक

रचनाकार कृतियाँ
नागार्जुनप्रज्ञापारमिता, सहस्त्रिका, चतुष्टिका, आर्यदेव
अश्वघोषबुद्धचरित, सौन्दरानंद, सारिपुत्र प्रकरण, सूत्रालंकार, वज्रसूची
असंगमहायान सूत्रालंकार
वसुबंधुअभिधर्म कोष
आर्यदेवचतुः शतिका
दिग्नांगप्रमाण समुच्चय
शांति देवशिक्षा समुच्चय, सूत्र समुच्चय

भागवत् धर्म (वैष्णव धर्म)

  • इस धर्म के प्रवर्तक वासुदेव कृष्ण माने जाते हैं, जिसका प्रथम उल्लेख छांदोग्य उपनिषद् में मिलता है।
  • यह पहला संप्रदाय था, जिसने ब्राह्मण धर्म की बुराइयों में सुधारात्मक रुख प्रदर्शित किया।
  • छांदोग्य उपनिषद में कृष्ण को घोर अंगीरस का शिष्य एवं देवकी पुत्र कहा गया है।

शैव धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय

  • पाशुपथ:
    • शैव धर्म के इस सबसे प्राचीन सम्प्रदाय के प्रवर्तक लकुलीश थे।
    • इसका उदय दूसरी सदी ईसा पूर्व में गुजरात में हुआ।
    • इस सम्प्रदाय के लोग लगुण्ड या दंड धारण करते थे।
    • पत्ति (स्वामी), पशु (आत्मा) तथा पाश (बंधन) इसके तीन अंग हैं।
  • कापालिक:
    • इसके मुख्य आराध्य भैरव थे, जो शिव के अवतार माने जाते हैं।
    • ये शरीर पर श्मशान की भस्म लगाते हैं तथा नरमुण्ड धारण करते हैं।
    • श्रीशैल इनका प्रमुख केंद्र था।
  • लिंगायत:
    • इसके उपासक जंगम कहलाते थे। इसका प्रसार दक्षिण में हुआ।
    • इसके प्रवर्तक अल्लप्रभु तथा उनके शिष्य वासव थे।
  • कालामुख:
    • इसका उदय कर्नाटक में हुआ।
    • शिवपुराण में इसके अनुयायियों को महाव्रतधर कहा जाता है।
  • कश्मीरी शैव:
    • यह शुद्ध रूप से दार्शनिक एवं ज्ञानमार्गी सम्प्रदाय था।
    • इसके संस्थापक वसुगुप्त थे।
    • इसमें शिव को अद्वैत शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है।
  • नाथ संप्रदाय:
    • इसका उदय 10वीं सदी में हुआ। इसके प्रवर्तक मच्छेन्द्रनाथ थे।
    • शिव को आदिनाथ मानते हुए नौ नाथों के दिव्य पुरुष के रूप में कल्पना की गयी है।
    • 10-11वीं सदी में इसका प्रचार-प्रसार गोरखनाथ ने किया।

शाक्त सम्प्रदाय

  • शाक्त उपासना के तीन केंद्र हैं- कश्मीर, कांची तथा असम।
  • कश्मीर तथा कांची श्रीविद्या के प्रमुख स्थल हैं तथा असम कौल का प्रसिद्ध केंद्र है।

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